दर्शन तो विचार शुन्यता में है

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तुम्हे मंजिल पे पहुचना है…अपने विचार, छल-छद्म से परिपूर्ण अपनी ओछी वृत्ति तुम्हें अपनी मंजिल तक पहुचने में बाधक है…सदगुरु दीक्षा धारण कर, उसमे खोकर विचार शुन्य मस्तिष्क का निर्माण करो, खुद में गहन उतर जाओगे…कही भटकने की जरूरत नहीं, जहा हो वही मंजिल अन्यथा दूर तक राह चलते, राही हो, राही ही रह जाओगे…निश्तेज चेहरा, पथरी आँखें, शुष्क होठ, निराश जीवन…राह चलते ही समाप्त हो जाओगे…

                 राह में चलते तुम खुद में नहीं राही में खो मंजिल भूल जाते हो…वाह!!! क्या स्त्री है?? काश!!…कितना अच्छा घर है, काश!!…स्त्री चाहिए तुम्हें, घर चाहिए तुम्हें…ऐसे नाना प्रकार की कामनाओं में लीन हो, तुम चलते चले जाते…मंजिल संकट मोचन…वाह!! क्या लड्डू है…शुद्ध देशी घी का बना है…काश!! सोचो जरा तुम…ऐसे विचारो का मंथन करते हुए अपनी लोलुपता की पूर्ति करने के लिए, मंजिल संकट मोचन पहुंचकर भी तुम नहीं पहुँच पाते…दर्शन कर भी नहीं कर पाते…पत्र, पुष्प चढ़ा बस वही चिंतन करते…लड्डू देशी घी का था, बड़ा स्वादिष्ट था…स्त्री बहुत सुन्दर थी, अपनी होने लायक थी…ऐसे नाना प्रकार के विचारो से आक्रांत हो तुम जहा से चले थे, वही पहुँच जाते हो…तुम्हारा संकट ज्यो का त्यों बना रहता है और जब तक दर्शन करोगे नहीं, तब तक बना भी रहेगा…

                  दर्शन तो विचारो से पार है…दर्शन तो विचार शुन्यता में है…तुम सोचो कि तुम्हे विचार शुन्य होना है, सदगुरु पास जाना है, दीक्षा धारण कर बस खोते चले जाना है…स्व दर्शन कर मंजिल पर पहुच जाना है…

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