”ब्रह्म” से मेरा तार-तार जुड़ा और झंकृत है – स्वामी कमलेश्वरानंद जी

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”ब्रह्म” से मेरा तार-तार जुड़ा और झंकृत है :

परम उत्सव गुरु पूर्णिमा महोत्सवसत्संग साधना शिविर, बाल्मीकि आश्रम, सीतामढ़ी, सीता समाहित स्थल (उ.प्र.) में पूज्य श्री गुरुदेवअपने साधकों एवं शिष्यों को संबोधित करते हुए अपनी ओजस्वी वाणी में दो टूक बात कही—-

“हे ! जन मानस, मेरे परम प्रभु, परम आराध्य ”निखिल-तत्व” से तादात्म रख मैं आप सभी को उस परम सत्ता से जोड़ने की कोशिश में ,एक मात्र आपका सदवेत्ता, गुणवेत्ता, प्रखर चेतना से संपृक्त आप सभी के समक्ष आप सभी का आवाहन करता हूँ…अपने प्रभु से मिल मैं ”चैतन्य” हुआ..मैं ”प्राणवन” हुआ..मैं ”ज्ञानवान” हुआ…आप जो प्राप्त करना चाहते हो, अपने ”प्रभु” को प्राप्त कर ,वो सब मैने पाया जो मैं चाहता था……

हे ! आओ न…तुम भी समाहित हो ..मेरे प्रभु को पा स्वयं को धन्य करो…जैसे ”निखिल स्वरुप” परमात्मा का एक स्वरुप, एक सुहास जिससे दुनिया संतृप्त और परिपूर्ण हुई…राम, कृष्ण, ईश्वर, अल्लाह जैसे नाम, वैसे निखिल एक नाम…अब फिर मैं स्वामी कमलेश्वरानंद कमल स्वरुप में ”परमात्मा” के एक और स्वरुप में आप सभी के बीच ,आप सभी के समक्ष, आपके साथ मैं आपको वही और वही बना देना चाहता हूँ, जो मैं हूँ…जो वो हैं……

तुम मुझे साधारण समझोगे मेरा कुछ नहीं जायेगा..मैं अतिसाधारण हूँ भी…पर ब्रह्मसे मेरा तार-तार जुड़ा और झंकृत है

हे ! आओ न ,तुम मुझे साधारण समझोगे मेरा कुछ नहीं जायेगा..मैं अतिसाधारण हूँ भी…पर ”ब्रह्म” से मेरा तार-तार जुड़ा और झंकृत है…हे ! ”कमल और कमलिनी” की भांति खिल कर मुझमें समाहित हो अपने आपको परमसत्ता से जोड़ जीवन को एक नयी दिशा दो…मोह-माया, क्रोध-लोभ, अहंकार इन सब वृक्रितियों से निकलो और आओ मेरे साथ…चलो मेरे साथ…मेरे प्रभु के पास…उससे स्वयं को जोड़ सत्कर्म कर स्वयं को स्थापित कर मानव जीवन को धन्य करो, यही मेरी प्रार्थना…निवेदन स्वीकार कर मेरा साथ दो…….

तुम खिलोगे, मैं खिलूँगा…जब-जब तुम खिलते हो, पुष्पित और पल्लवित होते हो मैं धन्य हो जाता हूँ…जानते हो क्यों? क्योंकि इस धरा पर हमारा आगमन ही इसी उद्येश्य के साथ हुआ है…आओ मेरे से मेरे परम आराध्य से खुद को जोड़ खुदी में खुदा बन अपना मानव जीवन धन्य करो…बड़ी अजीब बात है तुम परमात्मा के अंश नहीं स्वयं परमात्मा होते हुए अपने आपको भूलने की वजह से निरीह, निष्क्रिय हो बेजान मुर्दों की तरह पड़े हो…

हे ! मैं आपको जीवित करना चाहता हूँ…उत्तम बीज बना इस संसार सागर में लहलहाता देखना चाहता हूँ…ये सब उसकी रहमत और आपके प्रयास से होगा…तो आओ मेरे साथ एक बार फिर हम आपका आवाहन करते हैं…अपने प्रभु, अपने गुरु, अपने सुहास, अपने जान, अपनी जिंदगी से जो आपको सुसंस्कृत, सुव्यवस्थित और परमात्मा से तारमय जोड़, वही और वही बनाने के लिए आपके बीच आपका प्रभु……..

 – स्वामी कमलेश्वरानंद जी….

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