Sadguru Anand

Jeevan Pakhand me nahi Prem me lagao

ध्यान योग जन जाग्रति सेवा संस्थान द्वारा संचालित परम उत्सव गुरु पूर्णिमा सत्संग साधना शिविर वाल्मीकि आश्रम, सीता समहति स्थल (उ.प्र.) भदोही में पूज्य श्री गुरुदेव ने दुसरे सत्र में अपने साधको एवं शिष्यों को सहजता-सरलता-सद्भाव-समभावजैसे गुणों से सम्पन्न होने के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि… यह जीवन जन कार्य में आयें…ईश्वर को ह्रदय में …

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”ब्रह्म” से मेरा तार-तार जुड़ा और झंकृत है – स्वामी कमलेश्वरानंद जी

”ब्रह्म” से मेरा तार-तार जुड़ा और झंकृत है : ”परम उत्सव गुरु पूर्णिमा महोत्सव” सत्संग साधना शिविर, बाल्मीकि आश्रम, सीतामढ़ी, सीता समाहित स्थल (उ.प्र.) में ”पूज्य श्री गुरुदेव” अपने साधकों एवं शिष्यों को संबोधित करते हुए अपनी ओजस्वी वाणी में दो टूक बात कही—- “हे ! जन मानस, मेरे परम प्रभु, परम आराध्य ”निखिल-तत्व” से …

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निश्चल-निष्काम-प्रेम” की जरूरत है – स्वामी कमलेश्वरानंद जी

निश्चल-निष्काम-प्रेम” की जरूरत है : ”प्रेम” के बिना पूजा…”प्रेम” के बिना साधना और ”प्रेम” के बिना भक्ति पूर्ण नहीं वही एक ”परम” सभी का मार्ग-दर्शक …मार्ग-दर्शन तो हम सबका ”वही-एक” करता है…”वशिष्ठ” का भी वही किया, ”विश्वामित्र” का भी वही किया, ”कृष्ण” का भी उसीने किया और ”क्राइस्ट” का भी…सबका उसीने मार्गदर्शन किया ,लेकिन सभी …

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दर्शन तो विचार शुन्यता में है

तुम्हे मंजिल पे पहुचना है…अपने विचार, छल-छद्म से परिपूर्ण अपनी ओछी वृत्ति तुम्हें अपनी मंजिल तक पहुचने में बाधक है…सदगुरु दीक्षा धारण कर, उसमे खोकर विचार शुन्य मस्तिष्क का निर्माण करो, खुद में गहन उतर जाओगे…कही भटकने की जरूरत नहीं, जहा हो वही मंजिल अन्यथा दूर तक राह चलते, राही हो, राही ही रह जाओगे…निश्तेज …

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कलुषित मन

एक बार कुछ पंडित ”गंगा-जल” की महिमा का बखान करते हुए ”कबीर” साब से बोले…”गंगा” का पानी घोर-पापियों के पाप का कलुष धोकर उन्हें पवित्र कर सकता है…..        यह सुनकर कबीर ने अपने लोटे में रखा गंगा का पानी पंडितो को पीने के लिए दिया…इस पर पंडित बहुत क्रुद्ध हुए…एक ”नीच-जुलाहे” का …

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क्यों अधूरी जिंदगी जीते है हम…?

  एक व्यक्ति विशेष की पूरी जिंदगी ”तन-मन” के पोषण हेतु ”धन” कमाकर संसाधनों को जुटाने में ही समाप्त हो जाती है…वह भूल जाता है कि यह सब कुछ जिसके बल पे करता है ”स्वांस-प्राण-आत्मा” के ,उसकी शरण कभी नहीं जाता…हाँ अगर जाता भी है स्वांस की शरण ,तब जब ”दमा” हो जाता है ,जाता …

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काम राम…राम काम

  ”काम” के बिना राम नहीं और ”राम” के बिना काम नहीं…”तन-मन” और ”प्राण-आत्मा” के संयोजन से जीवन चलता है…तन-मन-प्राण की अपनी जरुरत भी है…समय विशेष में ”सुधीजन” हो या ”साधक” ”साधू” हो या ”सिद्ध” सभी अपनी इस आवश्यकता को पूरा कर ही लेते है……         आदर्श अपनी जगह रह जाता है …

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