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दर्शन तो विचार शुन्यता में है

तुम्हे मंजिल पे पहुचना है…अपने विचार, छल-छद्म से परिपूर्ण अपनी ओछी वृत्ति तुम्हें अपनी मंजिल तक पहुचने में बाधक है…सदगुरु दीक्षा धारण कर, उसमे खोकर विचार शुन्य मस्तिष्क का निर्माण करो, खुद में गहन उतर जाओगे…कही भटकने की जरूरत नहीं, जहा हो वही मंजिल अन्यथा दूर तक राह चलते, राही हो, राही ही रह जाओगे…निश्तेज …

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