Na tum Bhakt Na tum Bhagwan

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न तुम भक्त न तुम भगवान…न तुम शिष्य न तुम गुरु

                 ऐसे कई तथ्य होते है जिनकी हम आलोचना नहीं कर सकते ,जिन पर हम टिपण्णी नहीं कर सकते ,फिर भी करते हैं…तथ्यहीन, निराधार विचारों को प्रकट करते हैं और खुद को उससे जोड़ अपने को समझा तृप्त और संतुष्ट करते है ,वो अलग बात है कि वे तृप्त नहीं हो ,क्योंकि ऐसे लोग कुछ समझते नहीं ,केवल इसी प्रवंचनाओ में लगे अपने अहम् का पोषण करते है…..

                 जब हम सद्गुरु कृपा प्रसाद स्वांस, प्राण, आत्मा को चैतन्य करेंगे तो ही हमारा साधनात्मक ज्ञान विवेकमयी बुद्धि प्राप्त कर सकेगा और तब हमारी चेतना विशुद्ध हो सकेगी …तब समझ में आएगा कि रहस्य क्या है ?? ”नाम और रूपमें क्या रखा है और अगर रखा है तो सारे नाम उसीके ,सारे रूप उसीके…वही था”…”वही है”…और वही रहेगाभी…खेल उसी का है…हमें समझने की जरुरत है…..

                 बिलकुल कटु सत्य है कि वह किसी की बपौदी नहीं…ज्ञान-प्रेमतटस्थ है ,”शक्तिहै…सभी को अपने कर्मऔर भावके अनुसार शक्ति, ”चेतनाऔर पूर्ण चैतन्यकी सहज ही उपलब्धि होती है…कोई कुछ भी बन जाये, उसकी इच्छा, कृपा के बिना संभव नहीं…शिष्य भी वही बनता है और शिष्य में वही श्रद्धा-भाव बनकर जगत कल्याण में लगता है…उसकी मर्ज़ी कि वही गुरु बन शिष्यों के पूर्ण श्रद्धा-भाव का पोषण भी करता है…शिष्यभी वही है, ”गुरुभी वही है…भक्तभी वही है, ”भगवानभी वही है…किसी समय विशेष में वही शिष्यगुरु बनता है और वही गुरुशिष्य बनता है…इसी प्रकार वही भक्तऔर भगवानभी……

                 अभी इन दिनों उन्होंने मुझसे कहा कि – मैंही भक्त होता हूँ और मैंही भगवान होता हूँ…कोई शिष्य होगा या गुरु होगा ,कोई भक्त होगा भगवान होगा तो सिर्फ अपने अहम् का पोषण करेगा और अपने अहम् का विस्तार भी…

                 ‘हे प्रिय कमल ! तुम ये रहस्य जानते हो…जब मेरी इच्छा होती है तेरी भक्तिसे कृतार्थ होने के लिए तो मैंतुममे पूर्ण श्रद्धा-भावसे परिपूर्ण हो भक्तबन जाता हूँ…और तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न हो उसी समय विशेष में तुमसे जुड़े जीवात्माओ का भगवानबन जाता हूँ…न तुम भक्त न तुम भगवान…न तुम शिष्य न तुम गुरु…”मैं” जो सदा हर कालों में, समय विशेष में…किसी भाव गत जीवात्मा में चैतन्यहो नाम और रूप में प्रगट हो जगत कल्याणकरता हूँ…जैसे अब मैंतुम्हारे रूप में कर रहा हूँ…तुम यह जानते हो इसलिए सहज हो मेरे कार्य को प्रगति दे रहे हो…मेरा स्नेह, आशीर्वचन सदैव तुम्हारे साथ है…मैंअति प्रसन्न हूँ कि तुम मुझेजान पाए…अपनी प्यासबुझा तृप्तहो पाए…

                 और अंत में एक सन्देश भी शिष्य-गुरु, गुरु-शिष्य, भक्त-भगवान”, भगवान भक्त में यह जीवात्माएं न उलझे तो कल्याण प्रद होगा…इन दोनों में मुझे मान सहज, सरल, प्रेममय जीवन व्यतीत करते हुए, ”मुझमेविलीन हो…यही मेरी अभिलाषा है……

स्वामी कमलेश्वरानंद

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