Shree Krishna purn brahm swaroop is dhara par avtarit

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कृष्ण कंचन, कृष्ण कुंदन, कर्म कारिणी, कोमलता, भव्यता, विशालता लिए पूर्ण ब्रह्म स्वरुप में इस धरा पर अवतरित हो इस धरा को कांतिमय, कंचनमय, सुहाषित और सुगन्धित किये…कृष्ण प्रेम, कृष्ण पूजा, कृष्ण साधना, कृष्ण उपासना, कृष्ण प्रेम का प्रतीक नहीं, कृष्ण पूर्ण प्रेम…वैसे तो प्रभु का कोई रूप नहीं, कोई रंग नहीं फिर भी कृष्ण को दुनियाँ सावरियां कहती है….

कभी सोचा! श्याम में मीरा क्यों खो गाने लगी ? – “श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरियाँ…रंग दे चुनरियाँ…” की पुकार करती थी…श्याम भजती है…श्याम जपती है…श्याम पीती है…श्याम खाती है…क्योंकि श्याम हो जाना चाहती है….श्याम वर्ण से, दुनियाँ ने श्याम को नहीं जाना, न पहचाना…श्याम शलोना, श्याम जीवन्तता, श्याम परिपूर्णता, श्याम समर्पण, श्याम आनंद, श्याम आह्लाद….इसलिए श्याम-श्याम-श्याम…

हे! प्रियतमाओ वो आज भी है…श्याम तो आनंद है…आह्लाद है…वो कहाँ जा सकता है ??? आज भी हमारा श्याम हम सभी में खेल रहा है…आनंदित हो रहा है…आनंद दे रहा है….कृष्ण जन्माष्टमी का अर्थ, आप कृष्ण द्वारा बताये हुए पथ पर चलो…प्रेम करो…प्रेम से स्व को सीचों…प्रेम को फैलाओ…प्रेम को जन-जन में बीजा-रोपण करो, तब सच आप कृष्ण जन्मोत्सव मना पाओगे…

कृष्ण हमीं और आप की तरह एक साधारण माता-पिता के गर्भ से जन्म लिए, जैसे आप दुनिया में आये वैसे वो भी आये, पर कृष्ण परम पुरुष ब्रह्म मने जाते हैं…कृष्ण अवतरित हुए…साक्षात् ब्रह्म का अवतरण हुआ…हे प्रियात्माओ! यदि मैं कहूँ कि मैंने कृष्ण को देखा है तो आपको आश्चर्य होगा, और आप सोचेंगे कि मैं क्या कह रहा हूँ, पर जो कह रहा हूँ सत्य कह रहा हूँ…जी हाँ, आज भी कृष्ण इस धरा पर जन-जन में खेल रहा है…पुलकित हो रहा है…सुवासित हो रहा है…जहाँ प्रेम हैं वहा कृष्ण हैं, जहाँ सत्य हैं वहा कृष्ण हैं, जहाँ धर्म है, वहां कृष्ण है…धर्म वो नहीं जो आप समझते है, धर्म तो वो, जो कृष्ण ने समझाया…प्रेम करो…पर प्रेम का मतलब यह नहीं कि तुम अत्याचार सहो…भ्रष्टाचार का विरोध न करो…करो, उन्होंने भी किया…

कौरवों ने पांडवों के साथ अत्याचार किया…कृष्ण ने यहाँ धर्म का साथ दे और अधर्म का हनन किया…आप इस कृष्ण जन्माष्टमी पर संकल्प लो कि आप अत्याचारी, अधर्मी, अहंकारी न बनोगे…न बनने दोगे…पर याद रखें अधर्म की समाप्ति धर्म से, वैमनस्यता, बरबसता, बदमिजाजी से नहीं…मैं यह नहीं बताना चाहूँगा कि कृष्ण कहाँ और कैसे आये ? क्या किये कैसे जीवन जीये ? क्योंकि यही तो दुनिया और साधू-संत, महात्मा बताते हैं और हम सिर्फ इसी में फंसे हुए सत्य से दूर हैं…सच में जो कृष्ण है, उसे हम सभी को समझना और जानना चाहिए…वो आज भी आपमें हैं…आप उससे अनभिज्ञ हो…कृष्ण जन्मोत्सव मनाओ…जरूर मनाओ…पर ध्येय यह हो, प्रार्थना, आराधना यह हो कि कृष्ण हो जाओ तुम…तुम कहोगे कि पागल है…

आप कृष्ण हो जाओ…कृष्ण तो ब्रह्म थे, अवतरित थे…मैं कृष्ण कैसे हो सकता हूँ? मैंने बता दिया है कृष्ण का मतलब क्या है और हाँ आपकी प्रार्थना होगी तो कृष्ण आपको इस जन्माष्टमी पर अपने को अवश्य समझा देगा…ऐसा हो सके मेरी यही प्रार्थना प्रभु से…और आप सुधीजनों, साधकों और शिष्यों के लिए आशीर्वाद भी……

-स्वामी कमलेश्वरानंद जी

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